Dhan Dhan Matu Gang / धन धन मातु गङ्ग
Author
: Bhanu Shankar Mehta
Language
: Hindi
Book Type
: Reference Book
Category
: History, Art & Culture
Publication Year
: 2004
ISBN
: 8171243762
Binding Type
: Hard Bound
Bibliography
: xxiv + 272 Pages, Append., Size : Demy i.e. 22 x 14.5 Cm.

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डॉ० भानुशंकर मेहता सुख्यात लेखक हैं। पेशे से चिकित्सक होते हुए भी उन्होंने अनेक विधाओं में पुस्तकें लिखी हैं। साथ ही वे साहित्य, संगीत, नाटक, कला और समाज सेवा में उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं। जौनपुर में सन् १९२१ में जन्मे डॉ० मेहता इस वर्ष ८३ पूरे करके ८४वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं और आज भी जवान वृद्ध हैं। उनकी प्रकाशित कृतियों में भारतेन्दु (नाटक), सपनों के देश से (बाल नाटक), बोलने की कला (नाटक की तकनीकी शास्त्र), आयुॢवज्ञान का इतिहास (चिकित्साशास्त्र), सो काशी सेइअ कस न, अभिनन्दन (महापुरुषों के जीवन चरित्रों का अभिनन्दन) प्रभृति कृतियाँ दे चुके हैं। इनके अलावा बनारस, रंगमंच, संगीत, ललित निबन्ध, नाटक, कहानी, कविता के दर्जनों अप्रकाशित ग्रन्थ प्रकाशन की प्रतीक्षा में है। इनका काव्य संग्रह 'आस्था के गीतÓ और काव्य नाटक 'बाला जोगनÓ तथा यात्रा पुस्तक 'यात्रा और यात्राÓ ने यश प्राप्त किया है। आपकी संग्रहालयों में विशेष रुचि है और भारतीय विरासत की रक्षा के लिए विशेष आतुर हैं। भारत कला भवन और ज्ञान-प्रवाह के बनारस संग्रह का संयोजन इसी चेतना के साक्षी हैं। वे काशी में उसकी कला संस्कृति के ५० छोटे संग्रहालय बनाना चाहते हैं। मूलत: गुजराती होते हुए भी हिन्दी के अनन्य भक्त हैं और हिन्दी का भण्डार भरने हेतु गुजराती, मराठी, बंगला और अंग्रेजी से अनेक पुस्तकों का अनुवाद कर चुके हैं। 'गङ्गïाÓ पर उनकी यह पुस्तक नदी माता की वन्दना है। श्रीमद्भवद्गीता में भगवान ने कहा स्रोतसामस्मि जाह्नïवी। ऐसा कहकर श्रीकृष्ण ने गङ्गïा को महिमामयी बना दिया। वेद, पुराण, महाकाव्य, संत, महात्मा, मनीषी, कवि और दार्शनिक, लेखक और ङ्क्षचतक गङ्गïा का गुणगान करते रहे हैं। गङ्गïा के बारे में अपार सामग्री बिखरी पड़ी है जिसका नमूना इस पुस्तक में आपको मिलेगा। पश्चिमी दृष्टिï से गङ्गïा ब्रह्मïपुत्र और सिन्धु से छोटी है। विश्व की नदियों में उसका २८वाँ स्थान है पर प्राचीन सभ्यताओं की कहानी पढ़ें तो ज्ञात होगा वे सब नदी घाटियों में ही उपजी मिस्र नील नदी की घाटी में, सुमेरबाबुल दजला फरात के तट पर, चीन पीत नदी पर और भारत सिन्धु घाटी से पोषित हुआ। पर सबसे ऊँचे पर्वत हिमालय के आँगन का इतिहास तो गङ्गïा का ही इतिहास है। किसी ने ठीक कहा गङ्गïा ही भारत है और भारत गङ्गïा है। वह पयपान कराती है इसलिये 'माँÓ है। पालनकत्र्ता विष्णु के अवतार कृष्ण ने ठीक ही तो कहा 'नदियों में मैं गङ्गïा हूँÓ। यह उसी महिमामय नदी की कहानी है और साथ ही उसमें एक वेदना भी प्रवाहित है जिसे पुस्तक की भूमिका लेखक, श्रीमती कमला पाण्डेय ने चीखकर कहा है 'रक्षत गङ्गïामÓ-गङ्गïा की रक्षा करें। कल जब 'गङ्गïाÓ नहीं रहेगी तो हम आप कहाँ होंगे? इस ग्रन्थ में गङ्गïा में अवगाहन कीजिये और संकल्प लीजिये कि अपनी रक्षा के लिये, अपने अस्तित्व की रक्षा के लिये 'मैं गङ्गïा की रक्षा करूँगा।Ó माँ गङ्गïा आपका कल्याण करें। अनुक्रमणिका : प्रकाशकीय, प्रस्तावना, 1. गङ्गïा-अवतरण, 2. देवो देवी नदी गङ्गïा, 3. देवनदी गङ्गïा, 4. गङ्गïा तीरे वाराणसी, 5. घाट की बात, ६. धन धन मातु गङ्गï, ७. गङ्गïा : कला और साहित्य में, ८. भारतीय दृश्य कलाओं में गङ्गïा, ९. गङ्गïा और काशी, १०. गङ्गïा महिमा-राष्टï्रीय एकीकरण के सन्दर्भ में, ११. कितनी गङ्गïा-कितने काशी-प्रयाग, १२. काशी में कितनी गङ्गïा है, १३. गङ्गïा मैया-दौलत दासी, १४. गङ्गïा दशहरा, १५. शाश्वत गङ्गïा, १६. गङ्गïाजी कैसे आयीं? १७. काशी में गङ्गïा-स्नान, १८. गङ्गïा-कथा, १९. पावन गङ्गïा, २०. पवित्र नदी और फुल्टन, ....