Akhand Mahayog Ka Path aur Mrityu Vigyan / अखण्ड महायोग का पथ और मृत्यु-विज्ञान
Author
: Gopinath Kaviraj
Language
: Hindi
Book Type
: General Book
Category
: Adhyatmik (Spiritual & Religious) Literature
Publication Year
: 2018, 3rd Edition
ISBN
: 8AGAMKPAMVH
Binding Type
: Hard Bound
Bibliography
: viii + 152 Pages, Size : Demy i.e. 22 x 14 Cm.

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<div style="text-align: center;"><font size="4"><b style=""><font style="" color="#800000">अखण्ड महायोग का पथ और मृत्यु-विज्ञान</font></b></font></div><div style="text-align: left;"><font size="3"><span style="">योगीराज श्रीकृष्ण ने 'गीता' में कर्म की प्रधानता पर विशेष बल दिया है। कर्मयोग से सिद्ध महापुरुष का कर्मों से अपने लिए कोई संबंध नहीं रहता। महापुरुष का यह अनुभव होता है कि पदार्थ, शरीर, इंद्रियाँ, अंत:करण आदि केवल संसार के हैं और संसार से मिले हैं, अपने लिए नहीं। कारण यह है कि संसार के बिना कोई भी कर्म नहीं किया जा सकता। इसके अलावा मिली हुई कर्म-सामग्री का सम्बन्ध भी समष्टि के साथ है। अत: मनुष्य अगर शरीर, इंद्रियाँ, मन, बुद्धि, पदार्थ आदि का समष्टि के लिए उपयोग करे तो उसे महान शांति प्राप्त हो सकती है।&nbsp;</span></font></div><div style="text-align: left;"><font size="3"><span style="">प्रस्तुत पुस्तक 'अखंड महायोग का पथ और मृत्यु-विज्ञान' के जरिए विद्वान लेखक पं. गोपीनाथ कविराज ने कायिक शुद्धि के बहाने कर्मयोग का ही वर्णन किया है। सर्वप्रथम पाणिनी ने वाक् शुद्धि के भाषा शास्त्र और कायिक शुद्धि के लिए योगशास्त्र का प्रणयन किया था। वाक् शुद्धि और अंतर्मन की शुद्धि के बिना किसी भी प्रकार की सफलता अर्जित नहीं की जा सकती। कहने का तात्पर्य यह है कि भारतीय वाङ्मय में वाचिक और कायिक शुद्धि की परम्परा अनवरत रूप से चलती चली आ रही है। इस परम्परा में अनेक विद्वानों ने अपने-अपने ढंग से योगदान किया है। पं. गोपीनाथ कविराज चूँकि भारतीय संस्कृति, योग एवं तंत्रशास्त्र के प्रामाणिक विद्वान रहे हैं इसलिए उनका विश्लेषण अत्यन्त ही तार्किक एवं ग्राह्य बन सका है।</span></font></div><div style="text-align: left;"><font size="2"><b style=""><br></b></font></div><div style="text-align: left;"><font size="3" color="#800000"><span style="">साधक दीक्षा के समय गुरू से जब चैतन्य का आभास प्राप्त करते है, तब वह अपने उत्थान का मार्ग प्राप्त करते है और उसी को पकड़कर चलते रहते हैं। देह में अपांगचक्र के नीचे, अर्थात् नाभिप्रदेश के अधोभाग में एक त्रिकोण है। वह ऊर्ध्वमुख है। इस त्रिकोण के नीचे त्रिदल बिल्वपन्न की भाँति तीन दल दिखाई पड़ते है। वास्तव में, ये तीनों दल नहीं है-तीन कुण्डलिनियाँ सुप्तावस्था में है, दोनों किनारे दो, नीचे की ओर एक। इन तीनों में जो अध:स्थित है, वह दाये-बाये, दोनों और आच्छादनों से ढकी है। जब गुरू द्वारा चैतन्य संचारित होता है, जब दोनों ओर के ढक्कन खुल जाते है और जब मध्यस्थित शक्ति जाग्रत हो उठती है। इसका अर्थात् जहाँ से शक्ति धारा-रूप में निकलती है, उसका नाम सुषुम्णा-हद है। इसे एक प्रकार का शून्य रूप भी कहा जा सकता है।&nbsp;</span></font></div><div style="text-align: left;"><font size="2" color="#008000"><b style="">&nbsp;</b></font></div><div style="text-align: left;"><font size="2"><b style=""><br></b></font></div><div style="font-size: 12px;"><br></div>