Yatharthavad : Punarmulyankan / यथार्थवाद : पुनर्मूल्यांकन
Author
: Ajab Singh
Language
: Hindi
Book Type
: Reference Book
Category
: Hindi Literary Criticism / History / Essays
Publication Year
: 1998
ISBN
: 8171242014
Binding Type
: Hard Bound
Bibliography
: xvi + 100 Pages, Biblio, Size : Demy i. e. 22 x 14 Cm.

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काव्य, कला, साहित्य एवं दर्शन के चिन्तन एवं सर्जना के क्षेत्र में नित्य नए-नए रूपों का विकास हो रहा है। इनके नए-नए रूप समीक्षा के लिये चुनौती बनते जा रहे हैं। आज का रचनाकार, आज का आलोचक, आज का विचारक प्राचीन मान्यताओं की कसौटी पर सर्जनात्मक साहित्य का मूल्यांकन नहीं करना चाहता। इसके लिये नए साहित्यशास्त्र, समीक्षाशास्त्र, आलोचनाशास्त्र एव साहित्यालोचन की माँग कर रहा है। इसलिए आज काव्य, कला, साहित्य, जीवन, संस्कृति एवं दर्शन के क्षेत्र में मूल्यांकन को अद्यतन ज्ञानराशि तक पहुँचाने के लिए पुनर्मूल्यांकन की अपेक्षा होती है। हंगोरियन दार्शनिक जार्ज लुकाच ने यथार्थवाद की केन्द्रीय भूमिका के लिये मनुष्यता की समग्र पहचान पर विशेष बल दिया है। वास्तविक या पूर्ण यथार्थवाद मनुष्य की सम्पूर्ण अनुभूतियों की सही व्याख्या का नाम है। वास्तविक एवं पूर्ण यथार्थवाद मानववाद के विभिन्न आयामों के रेखांकन की माँग करता है। मानववाद अपनी सम्पूर्णता में वास्तविक यथार्थवाद है, सम्पूर्ण यथार्थवाद है। यही वास्तविक यथार्थ अपने विकास क्रम में मानववाद, नवमानववाद तथा अतिमानववाद का विस्तार बन जाता है। आज यथार्थवादी अवधारणा की व्याख्या पुनव्र्याख्या क्रम में रचनात्मक क्रान्तिकारी यथार्थवादी आध्यात्मिक-सांस्कृतिक चेतना की सारे संसार की अपेक्षा है।